Posted in Hindi Articles

अंगीकार : महिमामय विवाह

इफिसियों 5:22–33 (HINDI-BSI)
22 हे पत्नियों, अपने-अपने पति के आधीन रहो, जैसे प्रभु के। 
23 क्योंकि पति पत्नी का सिर है, जैसे मसीह कलीसिया का सिर है और वही देह का उद्धारकर्ता है। 
24 परन्तु जैसे कलीसिया मसीह के आधीन है, वैसे ही पत्नियां भी प्रत्येक बात में अपने-अपने पति के आधीन रहें। 
25 हे पतियों, अपनी-अपनी पत्नी से प्रेम रखो, जैसा कि मसीह ने कलीसिया से प्रेम करके अपने आप को उसके लिये दे दिया। 
26 कि उसको वचन के साथ जल के स्नान द्वारा शुद्ध करके पवित्र बनाए। 
27 और उसको एक ऐसी महिमावान कलीसिया बनाकर अपने सामने उपस्थित करे, जिस में न कलंक हो, न झुर्री, न ऐसी कोई वस्तु; वरन् वह पवित्र और निष्कलंक हो। 
28 इसी रीति से पतियों को भी अपनी-अपनी पत्नी से अपने ही समान प्रेम रखना चाहिए। जो अपनी पत्नी से प्रेम रखता है, वह अपने आप ही से प्रेम रखता है। 
29 क्योंकि किसी ने कभी अपने शरीर से बैर नहीं किया, वरन् उसका पालन-पोषण करता है और उसे सहेजता है, जैसा मसीह कलीसिया का करता है। 
30 क्योंकि हम तो उसके शरीर के अंग हैं। 
31 “इसी कारण पुरूष अपने माता-पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा और वे दोनों एक तन होंगे।” 
32 यह भेद तो बड़ा है, मैं मसीह और कलीसिया की दृष्टि से कहता हूँ। 
33 तौभी तुम में से हर एक अपनी पत्नी से अपने समान प्रेम रखे और पत्नी अपने पति का आदर करे। 

कुलुस्सियों 1:17 (HINDI-BSI)
और वही सब वस्तुओं से पहले है और उसी में सब वस्तुएं स्थिर रहती हैं। 

नीतिवचन 24:3-4 (HINDI-BSI)
³ बुद्धि से घर बनता है और समझ से स्थिर होता है। 
⁴ और ज्ञान के द्वारा उसके कोठे सब प्रकार की अनमोल और मनभावनी वस्तुओं से परिपूर्ण हो जाते हैं। 

रोमियों 5:5 (HINDI-BSI)
और आशा निराश नहीं करती, क्योंकि परमेश्वर का प्रेम हमारे ह्रदय में पवित्र आत्मा के द्वारा उंडेला गया है जो हमें दिया गया है। 

हे प्रेमी स्वर्गीय पिता, मैं यीशु मसीह, मेरे प्रभु और उद्धारकर्ता के नाम से तेरे सामने आता हूँ। मैं अपने जीवनसाथी ________ और हमारे विवाह संबंध के लिए तेरा धन्यवाद करता हूँ। प्रभु, तूने हमें अपने पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से एक आत्मा कर दिया है। इस अद्भुत विवाह वाचा के लिए मैं तेरा आभारी हूँ, जिसे मैं और मेरा जीवनसाथी आनंदपूर्वक जी रहे हैं।

प्रभु यीशु, तू हमारे विवाह संबंध में सर्वोच्च और प्रधान है। तू ही मेरे जीवनसाथी और मुझे बड़े प्रेम, सच्चे आदर, गहरी आत्मीयता और सदा नई ताजगी में जोड़े रखता है। हमारा विवाह दिन-प्रतिदिन और भी मधुर होता जा रहा है क्योंकि तू उसका आधार है। तेरे वचन के अनुसार, बुद्धि से घर बनता है, समझ से स्थिर रहता है और ज्ञान से उसकी कोठरियां अनमोल खज़ानों से भर उठती हैं। इसलिए हम दोनों पति-पत्नी तेरे वचन को गम्भीरता से लेते हैं, उसकी पहचान में बढ़ते हैं और उसके सिद्धांतों के अनुसार जीवन व्यतीत करने का प्रयत्न करते हैं। हम वचन के केवल सुननेवाले ही नहीं, बल्कि उस पर चलनेवाले भी हैं। इस प्रकार हमारा विवाह संबंध तेरे अचल और अडिग वचन की चट्टान पर टिका है। कोई वर्षा, आँधी, तूफ़ान हम पर प्रबल नहीं होगा। शत्रु की कोई भी चाल, गर्जना, या जलते हुए तीर हमारे विरुद्ध सफल नहीं होंगे। हमारा विवाह प्रभु यीशु, परमेश्वर के मेम्ने के बहुमूल्य लहू से ढका और सुरक्षित है।

हम एक दूसरे से उस प्रेम से प्रेम करते हैं जो परमेश्वर ने पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे ह्रदयों में उंडेला है। हम क्षमा करने में शीघ्रता करते हैं, तथा नाराज होने में धीमे हैं। हम एक-दूसरे के प्रति धीरज और दयालु हैं। हम झट से क्रोधित नहीं होते और कोई बुराई का हिसाब नहीं रखते। हम एक-दूसरे के गुणों और सकारात्मक पक्षों की सराहना करते हैं। हे प्रभु, हमारे ह्रदयों को तेरी करुणा और अनुग्रह से भर देने के लिये तेरा धन्यवाद।

हे प्रभु, धन्यवाद जो तूने मेरे जीवनसाथी और मुझे यह बुद्धि दी है कि हम अपने-अपने उत्तरदायित्व और भूमिकाएँ परिश्रम और नम्रता से पूरा कर सकें। धन्यवाद जो तू हमें सामर्थ्य देता है ताकि हम एकता में होकर तेरी सेवा करें और उस आज्ञा को पूरा करें जो तूने हमारे जीवन पर रखी है। धन्यवाद जो तू अपने राज्य का विस्तार करने और हमारे द्वारा हमारे राजा यीशु के गुणों को संसार में प्रगट करने के लिए अधिक अनुग्रह प्रदान करता है।

यीशु के नाम में मैं यह घोषित करता हूँ कि हम अलौकिक स्वास्थ्य, अलौकिक सम्पन्नता, अलौकिक बुद्धि, अलौकिक प्रभाव, अलौकिक अनुग्रह और अलौकिक सामर्थ्य में चलते हैं। हम साथ मिलकर एक आशीषित, अभिषिक्त और सामर्थी दंपत्ति हैं – जहाँ भी जाते हैं वहाँ आशीष पहुँचाते हैं। हम पवित्रता, उत्कृष्टता और असीम आनंद के साथ परमेश्वर की सेवा करते हैं। हे प्रभु, मुझे सही जीवनसाथी देने के लिए तेरा धन्यवाद। मैं अपने जीवनसाथी ________ के लिये बहुत धन्य हूँ और मैं तेरा गुणगान करता हूँ क्योंकि तूने मुझ पर बड़ा अनुग्रह किया है।

प्रभु यीशु, मेरे जीवनसाथी और मुझे यह सहायता कर कि हम एक-दूसरे में सर्वश्रेष्ठ देखें और सदा एक-दूसरे को तेरे साथ गहरे संबंध में बढ़ने के लिये प्रोत्साहित करें। प्रभु यीशु, तेरी कृपा हमारे विवाह पर है और इसी विवाह संबंध के द्वारा जगत तेरी महिमा को देखेगा और मसीह की देह बहुतायत से आशीषित होगी। हर दिन – दिन प्रतिदिन – हमारा तेरे प्रति प्रेम और हमारा आपसी प्रेम पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से और भी गहरा और गहरा होता जा रहा है।

हालेलुयाह! धन्यवाद यीशु! 🙌

नीतिवचन 31:10–31 (HINDI-BSI)
10 गुणवती स्त्री कौन पाएगा? क्योंकि उसका मूल्य मोतियों से भी बहुत अधिक है।

11 उसके पति का मन उस पर भरोसा रखता है और उसको लाभ की घटी नहीं होती। 
12 वह उसको अपने जीवन के सब दिनों में भलाई ही करती है, बुराई नहीं। 
13 वह ऊन और सन ढूंढकर अपने हाथों से मन लगाकर काम करती है। 
14 वह व्यापारियों के जहाजों के समान है; वह दूर से अपना भोजन लाती है। 
15 वह रात ही को उठकर अपने परिवार को भोजन देती है और अपनी दासियों को काम सौंपती है। 
16 वह किसी खेत पर दृष्टि करती है और उसे खरीद लेती है और अपनी आय से एक दाख की बारी लगाती है। 
17 वह अपनी कमर को शक्ति से कसती है और अपनी भुजाओं को दृढ़ बनाती है। 
18 वह समझ लेती है कि उसका व्यापार लाभकारी है। रात को भी उसका दीया नहीं बुझता। 
19 वह अपने हाथ से तकली पकड़ती है और अपनी अंगुलियों से ऊन कातती है। 
20 वह दरिद्र पर हाथ फैलाती है और कंगाल को हाथ बढ़ाती है। 
21 वह अपने परिवार के लिये हिम का भय नहीं करती, क्योंकि उसका परिवार सब लाल कपड़े पहनता है। 
22 वह अपने लिये बढ़िया आच्छादनों का प्रबंध करती है; उसका वस्त्र मलमल और बैंगनी रंग का होता है। 
23 उसका पति नगर फाटक पर प्रसिद्ध होता है, जब वह देश के पुरनियों के बीच बैठता है। 
24 वह सूती वस्त्र बनाकर बेचती है और पेटी बनाकर व्यापारी को देती है। 
25 वह बल और शोभा से ओढ़ी जाती है और आने वाले काल के विषय हँस सकती है। 
26 वह अपने मुँह से बुद्धि की बातें करती है और उसकी जीभ पर कृपा का उपदेश रहता है। 
27 वह अपने घराने के प्रबंध पर दृष्टि रखती है और आलस्य का भोजन नहीं खाती। 
28 उसके पुत्र उठकर उसको धन्य कहते हैं और उसका पति भी उसकी प्रशंसा करता है। 
29 “अनेक कन्याओं ने अच्छा काम किया है, परन्तु तू सब से बढ़कर है।” 
30 शोभा तो छलना है और रूप व्यर्थ है, परन्तु जो स्त्री यहोवा का भय मानती है वही स्तुति के योग्य होती है। 
31 उसके परिश्रम का फल उसको दिया जाए और उसके काम नगर फाटकों पर उसकी प्रशंसा करें। 

Leave a comment